कैसे बनता है भाग्य, जानें

कैसे बनता है भाग्य, जानें

जीवन में कर्म ही सबसे प्रधान है. कर्म की वजह से ही भाग्य बनता है. जीवन में कुछ पाने के लिए कर्म तो करना ही पड़ता है. बिना कर्म के कुछ नहीं मिलता. गीता में भी यही कहा गया है कि कर्म करो फल की इच्छा मत करो. कर्म के हिसाब से हर किसी का भाग्य बदलता रहता है. कई लोगों को कम प्रयास में सफलता हाथ लग जाती है, तो कुछ को काफी प्रयासों के बाद भी सफलता नहीं मिल पाती. ऐसा उनके संचित कर्म और प्रारब्ध के कारण होता है. बीते कई जन्मों के कर्म मनुष्य के जीवन में एकत्रित होते रहते हैं, उसमें अच्छे और बुरे दोनों तरह के कर्म शामिल हैं. जिस हिसाब से अच्छे और बुरे कर्मों की प्रधानता होती है, वो व्यक्ति के वर्तमान जीवन में प्रारब्ध बन जाते हैं.

केवल मनुष्य ही ऐसा जीव है जो निरंतर कर्म करते हुए अपने भाग्य को समय के अनुसार बदल सकता है. अगर किसी के प्रारब्ध में कष्ट लिखे हैं तो उसे कष्ट जरूर मिलेंगे. वो व्यक्ति अपने कष्ट कैसे काटता है वो उसका अपना तरीका है. अगर कोई भगवत भक्ती में लीन रहता है और उसके प्रारब्ध में कष्ट लिखे हैं तो उसे कष्ट जरूर मिलेगा लेकिन उसमें झेलने की शक्ति रहेगी, जो उसने अपने कर्म द्वारा अर्जित की है. उसने अपने भाग्य को बदला है. अच्छे कर्म द्वारा अपने आने वाले बुरे वक्त को टाला भी जा सकता है या फिर उसे हल्का किया जा सकता है. आप इस जन्म में जो करेंगे, वो अगले जन्मों के लिए प्रारब्ध होगा. इसलिए अच्छे से जीवन जीकर उसे सकारात्मक बनाइए.

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